Raghuvansh Mahakavyam Tritiya Sarg (रघुवंशमहाकाव्यम् तृतीया सर्गः)

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Acharya Narmdeshwar Kumar Tripathi - Sanskrit & Hindi

Raghuvansh Mahakavyam Tritiya Sarg (रघुवंशमहाकाव्यम् तृतीया सर्गः)

रघुवंशमहाकाव्यम् तृतीया सर्गः (Raghuvansh Mahakavyam Tritiya Sarg)

तृतीय सर्ग का सारांश

महर्षि वशिष्ठ के आश्रम से अयोध्या लौटकर नन्दिनी की कृपा से महारानी सुदक्षिणा ने रघुकुल की परम्परा को बनाये रखने के लिए गर्भ धारण किया। उसने मिट्टी भक्षण शुरु किया, यह विचार कर कि मेरा पुत्र समस्त पृथ्वी का एकत्र राज्य इन्द्र की तरह करेगा। महाराज दिलीप ने गर्भवती रानी की सम्पूर्ण दोहद-इच्छाओं की पूर्ति की, क्योंकि उनके लिए स्वर्ग में भी कोई वस्तु अप्राप्य नहीं थी।             
           समय पूर्ण होने पर महारानी ने पुत्ररत्न को जन्म दिया। लोकपालों के अंश से उत्पन्न उस पुत्र के तेज से जन्म लेते ही दीपकों की रोशनी फीकी पड़ गयी, शीतल, मन्द और सुगन्धित वायु बहने लगी, देवताओं ने दुन्दुभियाँ बजायीं । मेरा यह पुत्र अप्रतिहत गति वाला होगा, इसलिए गमनार्थक ‘रघु’ इस नाम से पुत्र को दिलीप ने विभूषित किया। वह शिशु शुक्लपक्ष के चन्द्रमा के समान बढ़ने लगा। उचित समय पर राजा ने उसका यज्ञोपवीत-संस्कार कर विद्याध्ययन के लिए भेजा। रघु ने समस्त विद्याओं को पढ़कर धनुर्वेद की शिक्षा अपने पिता अद्वितीय धनुर्धर दिलीप से ली। अनन्तर महाराज ने रघु का विवाह संस्कार किया।

Author : Acharya Narmdeshwar Kumar Tripathi

Publisher : Bharatiya Vidya Sansthan

Language : Sanskrit & Hindi

Edition : 2020

Pages : 96

Cover : Paper Back

ISBN :           -

Size : 12 x 1 x 18 ( l x w x h )

Weight : 

Item Code : BVS0172

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